एक डॉक्टर…
जो ऑपरेशन थिएटर में ज़िंदगियाँ बचाता था…
और फिर राजनीति के उस ऑपरेशन में उतर गया, जहाँ पूरे सिस्टम का इलाज करना था।
यह कहानी है Dr Mohammad Ayub की — और उनकी बनाई पार्टी Peace Party की।
एक ऐसी कहानी, जिसे समझे बिना उत्तर प्रदेश की राजनीति अधूरी लगती है।
डॉक्टर से नेता बनने तक का सफ़र
डॉ. मोहम्मद अय्यूब का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले में हुआ।
पढ़ाई में शुरू से तेज़ रहे डॉ. अय्यूब ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से मेडिकल शिक्षा प्राप्त की और सर्जरी जैसे कठिन क्षेत्र में एमएस की डिग्री हासिल की।
डिग्री के बाद उन्होंने गोरखपुर के बड़हलगंज क्षेत्र में बतौर सर्जन काम शुरू किया।
यहीं से शुरू होती है उनकी पहचान — जोड़ा हॉस्पिटल।
यह हॉस्पिटल सिर्फ़ इलाज का केंद्र नहीं था, बल्कि गरीबों, मज़लूमों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए भरोसे का नाम बन गया।
इलाके में डॉ. अय्यूब सिर्फ़ “डॉक्टर” नहीं, बल्कि “डॉक्टर साहब” कहे जाने लगे।
2007: राजनीति का बदलता चेहरा
साल 2007 में पूर्वांचल की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखने लगा।
Yogi Adityanath एक ताक़तवर नेता के रूप में उभर रहे थे।
हिंदू युवा वाहिनी से जुड़े कई चेहरे बीजेपी के टिकट पर जीत दर्ज कर रहे थे।
यहीं से डॉ. अय्यूब को लगा कि
“सिर्फ़ इलाज से समाज नहीं बदलेगा, अब सिस्टम का इलाज ज़रूरी है।”
2008: Peace Party का जन्म
2008 में डॉ. अय्यूब ने Peace Party की स्थापना की।
उस दौर में मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्ग के वोटर सपा, बसपा और कांग्रेस से निराश हो चुके थे।
आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह युवाओं की गिरफ़्तारी और बड़ी पार्टियों की चुप्पी —
यही वो मुद्दे थे, जिन पर Peace Party खुलकर बोली।
सिर्फ़ एक साल पुरानी पार्टी ने
22 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे
और दावा किया गया कि यह देश की छठी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
इसी दौर में आरोप भी लगे —
कि Peace Party बीजेपी और RSS की “बी-टीम” है।
डॉ. अय्यूब ने साफ़ कहा:
“हमारी लड़ाई सपा, बसपा और कांग्रेस से है — वही हमारे राजनीतिक विरोधी हैं।”
2012: विधानसभा में एंट्री
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में Peace Party ने
208 सीटों पर उम्मीदवार उतारे।
डॉ. अय्यूब हेलीकॉप्टर से प्रचार कर रहे थे,
रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही थी,
और शिक्षा में आरक्षण उनकी सबसे बड़ी मांग थी।
नतीजा चौंकाने वाला रहा —
Peace Party के 4 विधायक विधानसभा पहुँचे।
और डॉ. मोहम्मद अय्यूब खुद संत कबीर नगर की खलीलाबाद सीट से विधायक बने।
यूपी से बाहर निकलने की कोशिश
इसके बाद पार्टी ने
झारखंड, महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव और
दिल्ली नगर निगम चुनावों में भी हिस्सा लिया।
साफ़ संदेश था —
Peace Party सिर्फ़ यूपी तक सीमित नहीं रहना चाहती।
हार का दौर और गिरता ग्राफ
2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 51 सीटों पर चुनाव लड़ा,
लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई।
2017 विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी से गठबंधन हुआ,
मगर कुल वोट प्रतिशत सिर्फ़ 2% रह गया।
लगातार हारों ने पार्टी को हाशिये पर धकेल दिया।
2018: गोरखपुर का राजनीतिक उलटफेर
साल 2018 में गोरखपुर उपचुनाव ने राजनीति की दिशा बदल दी।
डॉ. अय्यूब का दावा रहा कि उन्होंने
Akhilesh Yadav और
Mayawati
को एक मंच पर लाने में अहम भूमिका निभाई।
निषाद पार्टी + सपा + बसपा समर्थन + Peace Party की ज़मीनी पकड़ —
और नतीजा…
प्रवीण निषाद की जीत!
बीजेपी को गोरखपुर में करीब 30 साल बाद हार का सामना करना पड़ा।
आज की Peace Party और भविष्य
आज Peace Party एक बार फिर खुद को संगठित करने में जुटी है।
आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं।
सवाल अब भी कायम हैं:
क्या Peace Party फिर से अपना पुराना असर दिखा पाएगी?
क्या डॉ. अय्यूब एक बार फिर यूपी की राजनीति का रुख़ बदल पाएँगे?
निष्कर्ष
यह कहानी है
एक डॉक्टर की…
एक पार्टी की…
और उस राजनीति की —
जो हार मानना नहीं जानती।
फैसला जनता करेगी —
अगले चुनाव में।
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